Thursday, July 9, 2009

कुछ बाकी है ...

रात की पलकों पे और सोना है मुझको ,
जगमगे से काफिले में और खोना है मुझको ,
की मेरा ख्वाब कुछ बाकी है ,
चीनी कम तो नही है लेकिन मिठास कुछ बाकी है .

फाटकों में बंद है जो कल्पना ,कहती है सोने को और
की मिनटों की दूरी में ये फाटक ख़ुदबखुद खुल जाएगा ,
रास्ता ख़ुद से ही कहेगा अब चलने को
ख्वाब ख़ुद से ही अपना मंज़र पायेगा .

आलस नही है ये ,नाही कोई ढोंग है ,
ना ही कोई बिस्तर पे पड़े रहने का रोग है ,
कुछ हलकी -फुलकी सी गुज़ारिश है ,
वो ख्वाब में हुई जो बारिश है ,
मुझे बस कुछ बूंदों को चखना है ,
कड़वी सी हुई तो शक्कर लाकर मीठा सा करना है ,
जो हुई नमकीन तो मुट्ठी में बंद कर लेना है ,
की जब कभी मै खुशी के मारे आंसुओ का स्वाद ही भूल जाऊं ,
तब उसी बूँद का नमक ज़रा सा चख लेना है .